नई दिल्ली: सामाजिक कार्यकर्ता और योजना आयोग की पूर्व सदस्य सैयदा हमीद ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निधन पर श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने मनमोहन सिंह को याद करते हुए लिखा है कि डॉ. मनमोहन सिंह के निधन की खबर ने मुझे स्तब्ध कर दिया है। ऐसा लगता है कि मेरे अंदर की सांसें थम गई हैं। सैयदा हमीद ने लिखा कि मैं पिछले दो दशक से डॉ. सिंह के दायरे में रही हूं। 2004 में योजना आयोग की सदस्य के तौर पर शपथ लेते हुए मैं उनके सामने खड़ी थी। 2024 में मैं एक बार फिर उनके सामने खड़ी थी।
अपनी आत्मकथा ‘ड्रॉप इन द ओशन’ लेकर उन्होंने इसके कवर पर बड़ी ही खूबसूरत लाइनें लिखी थीं। उन्होंने लिखा है कि डॉ. सिंह से दो दशक की जान-पहचान और नजदीकी के बाद आज अचानक मेरे समेत पूरे भारत और दुनिया के सामने एक शून्य आ खड़ा हुआ है। बहुत सारे लोगों को आज इस बात का अहसास होगा कि आखिर वो भारत के लिए क्या थे। मैं उनके साथ अपने निजी अनुभवों को साझा कर रही हूं। पाठक इसे पढ़ कर एक बड़े फलक पर चीजों को देख पाएंगे।
सैयदा हमीद लिखती हैं कि डॉ. सिंह बेहद कम बोलते थे। बेहद नपे-तुले अंदाज में। उनके कुछ शब्द ही मेरे दिल को छू गए। उन्होंंने कहा था कि बाहर निकलिए और देश में घूमिये, इसे पहचानिए। जो देखिएगा उसे लिखिएगा। कुसुम नैयर ने ‘ब्लॉसम इन द डस्ट’ लिखा था। ये 1961 की बात है। अब इसे अपडेट करने की जरूरत है।
उन्होंने लिखा है कि डॉ. सिंह हमारे देश की गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक थे। 2008 का समय था और मैं पीएम हाउस में गई थी। उस दौरान पाकिस्तान के चकवाल जिले के उनके गांव गाह से एक आदमी आया था। सीमा पार कर वो अपने स्कूल के दोस्त मोहना से मिलने आया था। वो शख़्स उस गांव का पानी और मिट्टी लेकर आया था। अली राजा मोहम्मद और मनमोहन सिंह 1947 में अलग हुए थे लेकिन 2008 में वो फिर मिले। न सिर्फ ये इलाका बल्कि पूरा दक्षिण एशिया डॉ. सिंह का बेहद अपना था।
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