सवाई माधोपुर: जिले में लगातार बढ़ती ठंड और संभावित शीत लहर एवं पाले को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों के हित में फसलों की सुरक्षा हेतु विस्तृत एडवाइजरी जारी की है। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक (विस्तार) राकेश कुमार अटल ने किसानों से समय रहते आवश्यक उपाय अपनाने की अपील की है। संयुक्त निदेशक ने बताया कि जिन रातों में पाला पड़ने की संभावना हो, उन रातों में रात्रि 12 बजे से 2 बजे के बीच खेतों की उत्तरी-पश्चिमी दिशा से आने वाली ठंडी हवाओं की ओर खेत की मेड़ों पर कूड़ा-कचरा, सूखी घास-फूस या अन्य व्यर्थ जैविक पदार्थ जलाकर धुआं करना चाहिए।
इससे खेत में धुएं की परत बन जाती है, जिससे वातावरण का तापमान बढ़ता है। सुविधा के लिए मेड़ों पर 10 से 20 फीट के अंतराल पर कूड़े-करकट के ढेर लगाकर धुआं किया जा सकता है। इस उपाय से खेत का तापमान लगभग 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ाया जा सकता है। पौधशालाओं, सीमित क्षेत्र वाले उद्यानों एवं नगदी सब्जी फसलों को पाले से बचाने के लिए फसलों को टाट, पॉलीथिन या भूसे से ढकने की सलाह दी गई है। वहीं, कीमती फसलों वाले खेतों में उत्तरी-पश्चिमी दिशा में वायुरोधी टाटियां लगाकर क्यारियों के किनारे बांधनी चाहिए, जिन्हें दिन में हटा देना चाहिए। उन्होंने बताया कि पाले की आशंका होने पर खेत में सिंचाई करना अत्यंत लाभकारी होता है।
नमी युक्त भूमि अधिक समय तक गर्मी बनाए रखती है, जिससे भूमि का तापमान अचानक नहीं गिरता और पाले से नुकसान की संभावना कम हो जाती है। सर्दी के मौसम में सिंचाई करने से खेत का तापमान 0.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, जिन दिनों पाले की संभावना हो, उन दिनों फसलों पर घुलनशील गंधक चूर्ण का 0.2 प्रतिशत घोल (2 ग्राम गंधक प्रति लीटर पानी) बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। ध्यान रहे कि छिड़काव इस प्रकार किया जाए कि घोल की फुहार पौधों पर अच्छी तरह पहुंचे। इस छिड़काव का प्रभाव लगभग दो सप्ताह तक रहता है। यदि इसके बाद भी शीत लहर की स्थिति बनी रहे तो 15-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव दोहराया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि सरसों, गेहूं, चना, आलू, मटर जैसी फसलों में घुलनशील गंधक का छिड़काव न केवल पाले से बचाव करता है, बल्कि इससे लौह तत्त्व की जैविक एवं रासायनिक सक्रियता भी बढ़ती है, जिससे पौधों की रोग-रोधक क्षमता में वृद्धि होती है और फसल जल्दी पकने में सहायता मिलती है। दीर्घकालीन उपायों के तहत किसानों को सलाह दी गई है कि खेतों की उत्तरी-पश्चिमी मेड़ों पर तथा बीच-बीच में उपयुक्त स्थानों पर वायु अवरोधक पेड़ जैसे शहतूत, शीशम, बबूल, खेजड़ी, अरडू एवं जामुन आदि लगाए जाएं। इससे ठंडी हवाओं के वेग को रोका जा सकता है और पाले से फसलों को स्थायी सुरक्षा मिलती है।
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