उत्तराखंड: उत्तराखंड का हिमालयी महाकुंभ कहे जाने वाली सबसे प्राचीन धार्मिक यात्राओं में शुमार नंदा देवी राजजात यात्रा इस साल नहीं होगी। इसकी घोषणा श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा समिति ने रविवार को कर्णप्रयाग में की है। गढ़वाल के राजा के वंशज और समिति के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुंवर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि हिमालयी क्षेत्र में होने वाले बदलाव और प्रशासनिक तैयारियों से जुड़े कई जरूरी काम अभी अधूरे हैं, जिसके कारण इस बार यात्रा कराना संभव नहीं है।
समिति ने सरकार से मांग की है कि नंदा देवी राजजात यात्रा के लिए कुंभ की तरह प्राधिकरण का गठन किया जाए। समिति का कहना है कि यह प्राधिकरण सिर्फ राजजात तक सीमित न रहे, बल्कि नंदा देवी लोकजात, वार्षिक यात्राओं और नंदा देवी से जुड़े सभी मेलों के लिए योजना तैयार करे और विकास कार्य भी कराए। समिति ने स्पष्ट किया कि प्राधिकरण का काम केवल व्यवस्थाओं और विकास से जुड़ा रहेगा, धार्मिक अनुष्ठानों में कोई छेड़*छाड़ नहीं होगी। समिति के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुंवर ने बताया कि यात्रा 2026 में प्रस्तावित थी जिसे अब वर्ष 2027 में कराने का निर्णय लिया गया है।
इसके लिए आने वाली वसंत पंचमी में यात्रा की मनौती की जाएगी और तारीख़ पर तस्वीर साफ होगी। ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में होने वाली यह यात्रा एशिया की सबसे लंबी पैदल (लगभग 280 किलोमीटर) और अधिकतम ऊँचाई (साढ़े 17 हजार फीट) वाली धार्मिक यात्रा मानी जाती है। जो रूपकुंड, ज्यूरागली-पास और शिला समुद्र ग्लेशियर के पास से होते हुए होमकुंड तक पहुँचती है। यह नंदा देवी के मायके से कैलाश जाने का प्रतीक मानी जाती है। यह यात्रा परंपरागत रूप से हर 12 साल में आयोजित होती है और पिछली राजजात यात्रा साल 2014 में संपन्न हुई थी।
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